रूसी भाषा से अनूदित ‘पशु-प्रेम की कहानियाँ’ नामक यह पुस्तक किशोर पाठकों के लिए है। इन कहानियों के रचनाकार उन्नीसवीं शताब्दी के रूसी लेखक डी. मामिन-सिबिर्याक हैं। कहानियों का अनुवाद रूसी भाषा से किया गया है। प्रस्तुत संकलन में उनकी छह कहानियाँ सम्मिलित हैं। इन कहानियों के पात्र विभिन्न पशु-पक्षी हैं।
‘शिकारी येमेल्या’ कहानी में शिकारी का हृदय परिवर्तन दिखाया गया है। इसके मुख्य पात्र हैं—मृग-शावक, हिरनी और तीतर।
‘पोस्तोइको’ कहानी उन कुत्तों के बारे में है जिन्हें कमेटी वाले पकड़कर ले जाते हैं। इस कहानी में कुत्तों के आपसी व्यवहार को दिखाया गया है। कहानी से यह पता चलता है कि मानव-समाज में पाई जाने वाली असमानता और ईर्ष्या जैसे अवगुण पशुओं के जीवन में भी देखे जा सकते हैं।
‘प्रियौमिश’ नामक कहानी में बूढ़े शिकारी तरास का हंस के प्रति प्रेम प्रदर्शित किया गया है, जो एक शिकारी की गोली से बच निकला था, लेकिन उसकी हंसिनी मारी गई थी।
‘भूरी शेडका’ नामक कहानी में पंखकटी नीलसर चिड़िया के प्रति शिकारी के दया भाव को दिखाया गया है।
‘आक बोजात’ नामक कहानी के मुख्य पात्र घोड़ा और उसका मालिक हैं। इसमें मनुष्य और पशु के पारम्परिक प्रेम को दर्शाया गया है।
‘बूढ़ा गौरा’ नामक कहानी में यह पढ़ने को मिलता है कि पालतू पक्षियों जैसे गौरा और गौरैया में क्या अंतर होता है।
इन कहानियों को पढ़कर मनुष्य और पशुओं के बीच के संबंधों की समझ विकसित होती है। डी. मामिन-सिबिर्याक की ये रूसी कहानियाँ हमारे किशोर पाठकों को अवश्य पसंद आएँगी और पशु-पक्षियों के प्रति उनकी रुचि बढ़ाने में सहायक सिद्ध होंगी।
डी. मामिन-सिबिर्याक
इस पुस्तक के रचनाकार दमांत्री नारकीसेविच मामिन-सिबिर्याक (1852–1912) हैं। डी. मामिन-सिबिर्याक का जन्म 6 नवंबर, 1852 को रूस के पेर्म प्रांत के एक पुरोहित परिवार में हुआ था। चार वर्ष तक आपने पुरोहिती की शिक्षा प्राप्त की। इसके बाद सेंट पीटर्सबर्ग जाकर पहले पशु-चिकित्सा का और फिर कानून का अध्ययन किया, लेकिन कुछ कारणों से उनकी शिक्षा अधूरी रह गई। इसके बाद आप यूराल क्षेत्र में वापस आ गए।
उन्होंने यूराल की खानों और मजदूरों के जीवन के बारे में लिखना शुरू किया। इस विषय पर उन्होंने कई उपन्यास लिखे, जिनके कारण उन्हें ‘यूराल का गोर्की’ भी कहा जाता है, हालांकि वह गोर्की के पूर्ववर्ती थे। यही कारण है कि गोर्की ने उन्हें अपना शिक्षक और मित्र समान माना।
1891 तक यूराल में रहने के बाद डी. मामिन-सिबिर्याक सेंट पीटर्सबर्ग चले गए। वहीं 15 नवंबर, 1912 को उनका देहांत हुआ।
डी. मामिन-सिबिर्याक के लेखन में बाल साहित्य का विशिष्ट स्थान है। किशोरों के लिए लिखी गई उनकी कहानियाँ हमेशा से ही लोकप्रिय रही हैं। उनकी अधिकांश कहानियों में पशुओं के जीवन का सजीव चित्रण मिलता है, जो इस पुस्तक में भी देखने को मिलेगा।
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